आज के समय में अगर हम अंतरराष्ट्रीय रक्षा बाजार (International Defense Market) पर नजर डालें, तो दुनिया की शायद ही कोई ऐसी मिसाइल होगी जिसकी डिमांड और ख्याति इतनी तेजी से बढ़ी हो, जितनी भारत और रूस द्वारा संयुक्त रूप से विकसित की गई ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल (BrahMos Supersonic Cruise Missile) की बढ़ी है। हाल ही में रशियन मीडिया ने अपने विभिन्न प्लेटफॉर्म्स पर एक रिपोर्ट और वीडियो पब्लिश किया है, जिसमें यह साफ तौर पर दिखाया जा रहा है कि किस तरह दुनिया भर के देश ब्रह्मोस को अपने जखीरे में शामिल करने के लिए लाइन लगाकर खड़े हैं।
एक समय था जब भारत को केवल दुनिया के सबसे बड़े 'हथियार आयातक' (Arms Importer) के रूप में जाना जाता था। लेकिन ब्रह्मोस की अचूक मारक क्षमता और 'मेक इन इंडिया' के तहत हुए इसके एडवांसमेंट ने भारत को एक ताकतवर 'हथियार निर्यातक' (Arms Exporter) की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया है। हालांकि, जहां एक तरफ ब्रह्मोस की सफलता की गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है, वहीं दूसरी तरफ भारत को एक नए और खतरनाक युद्ध का सामना करना पड़ रहा है—और वह है 'नैरेटिव वॉरफेयर' (Narrative Warfare) या सूचना युद्ध।
वैश्विक स्तर पर ब्रह्मोस की सुनामी: 1 बिलियन डॉलर का माइलस्टोन
ब्रह्मोस सिर्फ एक मिसाइल नहीं है; यह एक 'गेम-चेंजर' वेपन सिस्टम है जो किसी भी देश की कोस्टल डिफेंस (तटीय सुरक्षा) और ऑफेंसिव कैपेबिलिटी को रातों-रात कई गुना बढ़ा सकता है। मैक 2.8 से मैक 3.0 की सुपरसोनिक स्पीड से उड़ने वाली इस मिसाइल को दुनिया के किसी भी मौजूदा एयर डिफेंस सिस्टम द्वारा इंटरसेप्ट करना (रोकना) लगभग नामुमकिन है। यही कारण है कि आज दुनिया भर के देश इसे खरीदने के लिए आतुर हैं।
- फिलीपींस (Philippines): फिलीपींस वह पहला देश है जिसने ब्रह्मोस मिसाइल का ऐतिहासिक कॉन्ट्रैक्ट साइन किया था। उन्होंने इस मिसाइल सिस्टम को सफलतापूर्वक प्राप्त कर लिया है और आज वे अपनी समुद्री सीमाओं (विशेषकर साउथ चाइना सी में चीनी अतिक्रमण के खिलाफ) को सुरक्षित करने के लिए इसे सक्रिय रूप से ऑपरेट कर रहे हैं।
- वियतनाम (Vietnam): हाल ही में भारत के डिफेंस सेक्रेटरी ने इस बात की आधिकारिक पुष्टि कर दी है कि वियतनाम भी ब्रह्मोस परचेस करने जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक, यह डील लगभग अपने अंतिम चरण में है और इसकी कुल कीमत 650 मिलियन डॉलर ($650M) के करीब आंकी जा रही है। वियतनाम के लिए यह डील सामरिक रूप से बेहद अहम है।
- इंडोनेशिया (Indonesia): दक्षिण-पूर्व एशिया का एक और प्रमुख देश इंडोनेशिया भी अपनी नौसेना और तटीय रक्षा को मजबूत करने के लिए ब्रह्मोस मिसाइल खरीदना चाहता है। रिपोर्ट्स की मानें तो यह डील भी अपनी फाइनल स्टेज पर है, जो मोस्ट प्रोबेबली 500 से 600 मिलियन डॉलर के बीच होने वाली है।
अगर हम केवल इन तीन देशों (फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया) के रक्षा सौदों को ही मिला लें, तो भारत बहुत जल्द ही सिर्फ इन तीन देशों को एक बिलियन डॉलर ($1 Billion) से भी ज्यादा के ब्रह्मोस मिसाइल बेच चुका होगा। यह भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा उद्योग के लिए एक अकल्पनीय और ऐतिहासिक उपलब्धि है।
दुनिया के हर महाद्वीप में ब्रह्मोस की मांग
ब्रह्मोस की डिमांड केवल एशिया तक सीमित नहीं है। अगर हम उत्तरी अमेरिका (यूएस, कनाडा, मेक्सिको) को छोड़ दें, तो दुनिया के लगभग हर प्रमुख कॉन्टिनेंट से ब्रह्मोस को लेकर जबरदस्त इंक्वायरी आ रही है:
🔹 साउथ ईस्ट एशिया: थाईलैंड, ब्रूनाई और मलेशिया जैसे देश इस सुपरसोनिक मिसाइल को लेकर बहुत ज्यादा इंटरेस्टेड हैं।
🔹 साउथ अमेरिका: ब्राजील, वेनेजुएला, चिली और अर्जेंटीना जैसी कंट्रीज ने भी ब्रह्मोस के विभिन्न वेरिएंट्स में अपना गहरा इंटरेस्ट शो किया है।
🔹 मिडल ईस्ट (मध्य पूर्व): इजिप्ट, सऊदी अरेबिया, यूएई (UAE) और ओमान जैसे शक्तिशाली देश भी अपनी सेनाओं के लिए ब्रह्मोस लेने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
🔹 अफ्रीका: अफ्रीका महाद्वीप से दक्षिण अफ्रीका (South Africa) भी ब्रह्मोस सिस्टम को परचेस करने पर विचार कर रहा है।
ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor) का प्रभाव
हथियारों के अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोई भी देश सिर्फ कागज पर लिखी स्पेसिफिकेशन्स (Specifications) देखकर करोड़ों डॉलर खर्च नहीं करता। देशों को 'बैटल-प्रूवन' (Battle-Proven) यानी युद्ध के मैदान में परखी गई तकनीक चाहिए होती है। ब्रह्मोस के मामले में यह टर्निंग पॉइंट साबित हुआ 'ऑपरेशन सिंदूर' (Operation Sindoor)।
ऑपरेशन सिंदूर होने के बाद से ही विभिन्न देशों से ब्रह्मोस मिसाइल को लेकर इंक्वायरीज की बाढ़ आ गई है। जब दुनिया के सैन्य पर्यवेक्षकों और विदेशी रक्षा मंत्रालयों ने देखा कि यह मिसाइल वास्तविक युद्ध जैसी परिस्थितियों या सर्जिकल ऑपरेशन्स में पिन-पॉइंट एक्यूरेसी (सटीकता) के साथ अपने टारगेट को नेस्तनाबूद कर सकती है, तो उनके मन में ब्रह्मोस की विश्वसनीयता को लेकर कोई शक नहीं बचा। इस एक ऑपरेशन ने ब्रह्मोस की मार्केटिंग उस तरह से कर दी, जो शायद करोड़ों डॉलर के विज्ञापन भी नहीं कर सकते थे।
चीन-पाकिस्तान का फेलियर: JF-17 थंडर का फ्लॉप शो
जहां एक तरफ भारत की ब्रह्मोस मिसाइल सफलता के नए झंडे गाड़ रही है, वहीं दूसरी तरफ अगर हम भारत के पड़ोसियों यानी चीन और पाकिस्तान के रक्षा निर्यात की बात करें, तो स्थिति बेहद दयनीय नजर आती है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है चीन और पाकिस्तान का संयुक्त प्रोजेक्ट—JF-17 थंडर (JF-17 Thunder) फाइटर जेट।
JF-17 मूल रूप से चीन की तकनीक पर आधारित एक एक्सपोर्ट वेरिएंट है जिसे 'सस्ते लड़ाकू विमान' के रूप में प्रमोट किया गया था। लेकिन हकीकत यह है कि आज तक दुनिया की किसी भी मेजर या महत्वपूर्ण मिलिट्री पावर ने इसे नहीं खरीदा है। इसके वर्तमान खरीदार और ऑपरेटर्स केवल अज़रबैजान, नाइजीरिया, म्यांमार (जहां वर्तमान में मिलिट्री राज है) और खुद पाकिस्तान हैं।
इस विमान की क्वालिटी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि म्यांमार में इसे लेकर भारी तकनीकी शिकायतें आईं, और हाल ही में वहां के लोकल प्रोटेस्टर्स (विद्रोहियों) ने एक JF-17 थंडर विमान को मार भी गिराया था। भविष्य में लीबिया और सोमालिया जैसे अस्थिर देश भले ही इसे मजबूरी में खरीद लें, लेकिन इसके अलावा दुनिया का कोई भी देश जेनुइनली इस विमान पर भरोसा करता नजर नहीं आ रहा है।
इंटरनेशनल प्रोपगेंडा और 'नैरेटिव वॉरफेयर' की चुनौती
जब दुश्मन आपको सीधे युद्ध के मैदान या अंतरराष्ट्रीय बाजार (मार्केट) में नहीं हरा पाता, तो वह 'नैरेटिव वॉरफेयर' (Narrative Warfare) का सहारा लेता है। जहां एक तरफ ब्रह्मोस की वास्तविक डील्स हो रही हैं और करोड़ों डॉलर सीधे भारत के बैंक अकाउंट्स में ट्रांसफर हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ चीन और पाकिस्तान मिलकर इंटरनेशनल मीडिया में भारत के हथियारों की छवि खराब करने के लिए एक बड़ी साजिश रच रहे हैं।
चीन और पाकिस्तान मिलकर मीडिया रिपोर्ट्स, गुमनाम आर्टिकल्स और पेड पीआर (Paid PR) के जरिए एक झूठा नैरेटिव सेट करने की कोशिश कर रहे हैं। इस नैरेटिव वॉर की ताकत कितनी गहरी है, इसका अंदाजा हाल ही में यूरोप में घटी एक घटना से लगाया जा सकता है।
सर्बिया के राष्ट्रपति का विवादित बयान
यूरोप के देश सर्बिया के राष्ट्रपति (जिन्हें आज के समय प्रो-यूएस माना जाता है) ने हाल ही में एक पब्लिक स्टेटमेंट दिया। उन्होंने गर्व से बताया कि सर्बिया के पास 400 किमी की मारक क्षमता वाली एडवांस चाइनीज मिसाइलें आ चुकी हैं। लेकिन इसके बाद उन्होंने जो कहा, वह हैरान करने वाला था।
सर्बिया के राष्ट्रपति ने बिना किसी ग्राउंड एविडेंस, बिना किसी सैटेलाइट इमेज या ऑफिशियल मिलिट्री रिपोर्ट के, इंटरनेट पर छपे एक गुमनाम (Anonymous) आर्टिकल के हवाले से यह दावा कर दिया कि—"हाल ही में हुई इंडिया-पाकिस्तान कॉन्फ्लिक्ट के दौरान चाइनीज मिसाइल ने भारत के S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम को पूरी तरह से डिस्ट्रॉय कर दिया था।"
यह बयान इंटरनेशनल प्रोपगेंडा की चरम सीमा है। यह दर्शाता है कि एक देश का सर्वोच्च नेता भी उसी झूठे नैरेटिव का शिकार हो गया जो चीन द्वारा प्रायोजित आर्टिकल्स में परोसा जा रहा था। भले ही जमीनी हकीकत यह है कि भारत का रक्षा तंत्र पूरी तरह से सुरक्षित है और सैटेलाइट इमेजेस कुछ और ही कहानी बयां करती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के खिलाफ ऐसा खतरनाक नैरेटिव सेट किया जा रहा है जिसे भारत सरकार और मीडिया को तुरंत काउंटर करना होगा।
अतीत का परसेप्शन बनाम आज की हकीकत (पश्चिमी देशों का दोहरा रवैया)
ऐसा नहीं है कि सिर्फ चीन और पाकिस्तान ही इस नैरेटिव वॉर में शामिल हैं। कुछ समय पहले तक पश्चिमी देशों (विशेषकर अमेरिका) के कई थिंक-टैंक्स भी ब्रह्मोस को लेकर नेगेटिव परसेप्शन बना रहे थे।
साल 2023 और 2024 के आसपास कई प्रो-अमेरिकन जर्नलिस्ट्स और प्रमुख जियोपॉलिटिकल थिंक-टैंक्स ने रिपोर्ट्स पब्लिश की थीं। उनका तर्क था कि भले ही ब्रह्मोस की स्पीड (मैक 2.8+) और पेलोड कैपेसिटी शानदार है, लेकिन आधुनिक युद्ध में यह मिसाइल ज्यादा 'यूज़फुल' नहीं है। यहां तक कि अमेरिका के एक जाने-माने डिफेंस एक्सपर्ट ऐशली टेलिस (Ashley Tellis) ने भारत की इस सुपरसोनिक मिसाइल को 'इनइफेक्टिव' (निष्प्रभावी) तक कह दिया था और फिलीपींस की सरकार को खुलेआम सलाह दी थी कि वे भारत से ब्रह्मोस न खरीदें।
लेकिन समय ने करवट ली। 'ऑपरेशन सिंदूर' में जब ब्रह्मोस का लाइव एक्शन देखा गया और इसने विपक्षी फैसिलिटीज को पूरी सटीकता के साथ तबाह किया, तब से पश्चिमी विशेषज्ञों के मुंह बंद हो गए। पूरी दुनिया का नजरिया रातों-रात बदल गया और जो मिसाइल कल तक 'इनइफेक्टिव' बताई जा रही थी, आज उसी मिसाइल को खरीदने के लिए ढेरों देश कतार में खड़े हैं।
निष्कर्ष: आगे की राह और भारत की जिम्मेदारी
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि 'ब्रह्मोस एयरोस्पेस' डिफेंस के क्षेत्र में भारत और रशिया के सहयोग की सबसे बड़ी सक्सेस स्टोरी बन चुका है। इसने साबित कर दिया है कि भारतीय इंजीनियरिंग विश्व स्तर के हथियारों का निर्माण कर सकती है।
लेकिन आज सिर्फ बेहतरीन हथियार बनाना ही काफी नहीं है; हमें उसे बेचना और उसके इर्द-गिर्द बुने गए झूठ को काटना भी आना चाहिए। सबसे बड़ी ज़रूरत इस बात की है कि ब्रह्मोस की वास्तविक क्षमता, इसके सफल टेस्ट्स और हो चुकी डील्स की जानकारी को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा से ज्यादा प्रमोट किया जाए। भारत को अपनी 'डिफेंस डिप्लोमेसी' (Defense Diplomacy) और 'इन्फॉर्मेशन सेल' को आक्रामक रूप से काम पर लगाना होगा।
दुनिया भर के डिफेंस एनालिस्ट्स, पत्रकारों और विदेशी नेताओं को सही तथ्य पता होने चाहिए, ताकि भविष्य में कोई भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष (जैसे सर्बिया के राष्ट्रपति) किसी झूठी चीनी रिपोर्ट या पाकिस्तानी प्रोपगेंडा के आधार पर भारत के S-400, तेजस या ब्रह्मोस जैसी विश्वस्तरीय प्रणालियों पर सवाल उठाने की जुर्रत न कर सके। भारत को अब न केवल मिसाइल वॉरफेयर जीतना है, बल्कि इस 'नैरेटिव वॉरफेयर' को भी हर हाल में जीतना होगा।







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