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Syama Prasad Mukherjee Story in Hindi: बंगाल को कैसे बचाया और RSS से क्यों मिले थे '5 सोने के सिक्के'?

श्यामा प्रसाद मुखर्जी: वह महानायक जिसने 'पश्चिम बंगाल' को बचाया और जिसे RSS से मिले थे "5 सोने के सिक्के" (पूरी कहानी)

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह सिर्फ चुनावों का देश नहीं है, बल्कि किस्से और कहानियों का एक ऐसा महासागर है, जिसकी गहराइयों में हमारे इतिहास के अनगिनत रहस्य दबे हुए हैं। जब भी भारत के इतिहास, जनसंघ की स्थापना और पश्चिम बंगाल के वजूद की बात आती है, तो एक नाम सबसे पहले उभर कर सामने आता है— डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी (Dr. Syama Prasad Mukherjee)

आज हम जिस पश्चिम बंगाल को भारत का एक अभिन्न अंग मानते हैं, वह शायद आज भारत का हिस्सा होता ही नहीं। 1947 में जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हो रहा था, तब एक बहुत बड़ी साजिश रची जा रही थी बंगाल को भारत से अलग करने की। अगर उस समय डॉ. मुखर्जी ने अपनी जान की बाज़ी लगाकर इस साजिश को नाकाम न किया होता, तो भारत का नक्शा कुछ और ही होता। ज़्यावार्ता (Zyvarta) की इस विशेष ऐतिहासिक रिपोर्ट में आज हम आपको श्यामा प्रसाद मुखर्जी के जीवन के उन अनछुए पहलुओं के बारे में बताएंगे, जिन्हें इतिहास की किताबों में अक्सर दबा दिया जाता है। साथ ही जानेंगे कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने उन्हें कौन से "5 सोने के सिक्के" दिए थे, जिन्होंने आज की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की नींव रखी।

1. एक प्रतिभाशाली शुरुआत: 1901 का वह साल

कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक बेहद संपन्न और प्रतिष्ठित परिवार में 6 जुलाई 1901 को एक बच्चे का जन्म हुआ। पिता का नाम सर आशुतोष मुखर्जी था, जो अपने समय के एक महान शिक्षाविद और कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश थे। इस प्रतिभावान बच्चे का नाम रखा गया— श्यामा प्रसाद मुखर्जी।

श्यामा प्रसाद बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के थे। उन्होंने 1921 में अंग्रेजी में बी.ए. किया और 1923 में बंगाली भाषा में एम.ए. की डिग्री हासिल की। 1926 में वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह इंग्लैंड चले गए और 1927 में वहां से बैरिस्टर बनकर लौटे। केवल 33 वर्ष की आयु में वह कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे कम उम्र के कुलपति (Vice-Chancellor) बन गए थे। लेकिन नियति ने उनके लिए वकालत या शिक्षा की दुनिया से कहीं बड़ा राजनीतिक मंच तैयार कर रखा था।

2. बंगाल की राजनीति में प्रवेश और मुस्लिम लीग से टकराव

1930 के दशक के अंत तक, भारत की आज़ादी की लड़ाई अपने चरम पर थी। 1937 में बंगाल में प्रांतीय चुनाव हुए, जिसके बाद कृषक प्रजा पार्टी और मुस्लिम लीग ने मिलकर गठबंधन सरकार बनाई। यह वह दौर था जब बंगाल में मुस्लिम लीग का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा था और ग्रामीण तथा किसान वर्ग की राजनीति को सांप्रदायिक रंग दिया जा रहा था।

इसी समय डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल की राजनीति में एक मजबूत और मुखर विपक्षी आवाज़ बनकर उभरे। वे एक ऐसे नेता थे जो हिंदू समाज की सुरक्षा और प्रशासनिक अधिकारों की रक्षा के लिए बिना डरे अपनी बात रखते थे। 1941 में जब फजलुल हक के नेतृत्व में बंगाल में एक नई गठबंधन सरकार बनी, तो मुखर्जी उसमें वित्त मंत्री (Finance Minister) बने। लेकिन मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक नीतियों और अंग्रेजों के पक्षपाती रवैये से तंग आकर उन्होंने एक साल के भीतर ही इस्तीफा दे दिया। बाद में 1944 में वे अखिल भारतीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष बन गए।

3. 'यूनाइटेड बंगाल' (United Bengal) की खतरनाक साजिश

कहानी में सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 1947 में भारत का विभाजन (Partition) तय हो रहा था। उस समय अंग्रेजों और मुस्लिम लीग के नेताओं के बीच एक तीसरा गुप्त प्रस्ताव भी चर्चा में था— "यूनाइटेड बंगाल" (United Bengal) का प्रस्ताव।

इस प्रस्ताव के मुख्य समर्थक बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन शहीद सुहरावर्दी थे। उनका तर्क था कि अगर बंगाल को पूर्वी बंगाल (आज का बांग्लादेश) और पश्चिम बंगाल में बांटा गया, तो बंगाल की अर्थव्यवस्था बर्बाद हो जाएगी। कोलकाता जैसे महानगर का महत्व खत्म हो जाएगा। सुहरावर्दी चाहते थे कि पूरे बंगाल को मिलाकर एक अलग स्वतंत्र देश बना दिया जाए, जो न तो भारत का हिस्सा हो और न ही सीधे तौर पर पश्चिमी पाकिस्तान का।

मुखर्जी का प्रचंड विरोध: "यह वर्चुअल पाकिस्तान होगा"

श्यामा प्रसाद मुखर्जी इस 'यूनाइटेड बंगाल' थ्योरी के सबसे बड़े और कट्टर विरोधी बनकर सामने आए। वे सुहरावर्दी की चाल को समझ चुके थे। मुखर्जी का तर्क बहुत स्पष्ट था— अगर बंगाल को एक अलग देश बनाया गया, तो मुस्लिम बहुल होने के कारण यह बहुत जल्द "वर्चुअल पाकिस्तान" (Virtual Pakistan) बन जाएगा। 1946 में कोलकाता में हुए भयानक दंगों (Direct Action Day) और नोआखली में हिंदुओं के नरसंहार के बाद, मुखर्जी यह बात अच्छी तरह जान गए थे कि एक 'यूनाइटेड बंगाल' में अल्पसंख्यक हिंदुओं का कोई भविष्य नहीं होगा।

4. बंगाल का विभाजन और पश्चिम बंगाल का उदय

फरवरी 1947 में हिंदू महासभा ने मुखर्जी के नेतृत्व में खुलकर यह प्रस्ताव पास किया कि अगर भारत का विभाजन धार्मिक आधार पर हो रहा है, तो बंगाल का विभाजन भी उसी आधार पर होना चाहिए। मुखर्जी ने पूरे बंगाल में घूम-घूम कर रैलियां कीं और लोगों को समझाया कि यदि हम आज नहीं बंटे, तो हमारा अस्तित्व मिट जाएगा।

उनके दबाव और अचूक तर्कों के सामने आखिरकार ब्रिटिश सरकार, कांग्रेस और मुस्लिम लीग को झुकना पड़ा। 'यूनाइटेड बंगाल' का प्रस्ताव डस्टबिन में डाल दिया गया। बंगाल का विभाजन हुआ— मुस्लिम बहुल पूर्वी हिस्सा 'पूर्वी पाकिस्तान' (अब बांग्लादेश) बना और हिंदू बहुल पश्चिमी हिस्सा 'पश्चिम बंगाल' के रूप में भारत का एक मजबूत राज्य बना। यदि आज पश्चिम बंगाल भारत का हिस्सा है, तो इसका शत-प्रतिशत श्रेय सिर्फ और सिर्फ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी को जाता है।

5. आरएसएस (RSS) के वो '5 सोने के सिक्के' (The 5 Gold Coins)

देश आज़ाद हुआ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी पंडित जवाहरलाल नेहरू की पहली कैबिनेट में उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। लेकिन नेहरू की नीतियों (विशेषकर पाकिस्तान के साथ लियाकत-नेहरू समझौते) से मतभेद के चलते उन्होंने 1950 में कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। महात्मा गांधी की हत्या के बाद कुछ वैचारिक मतभेदों के कारण मुखर्जी हिंदू महासभा से भी अलग हो चुके थे।

1950 के दशक की शुरुआत में देश को पहले आम चुनाव का सामना करना था। मुखर्जी एक नया और मजबूत राष्ट्रवादी राजनीतिक दल बनाना चाहते थे। इस उद्देश्य से वे नागपुर गए, जहाँ उनकी मुलाकात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के तत्कालीन सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर (जिन्हें प्यार से 'गुरुजी' कहा जाता था) से हुई।

मुखर्जी ने नई पार्टी के लिए गुरुजी से सहयोग मांगा। शुरुआत में गोलवलकर ने इनकार कर दिया क्योंकि RSS हमेशा से खुद को राजनीति से दूर एक सांस्कृतिक संगठन मानता था। वे किसी सीधे राजनीतिक दल का निर्माण नहीं करना चाहते थे। मुखर्जी खाली हाथ लौट आए, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

कुछ महीनों बाद, संघ के भीतर भी यह चर्चा होने लगी कि 1948 में संघ पर लगे प्रतिबंध के बाद, राजनीतिक रूप से एक मजबूत मंच का होना आवश्यक है जो उनकी विचारधारा की रक्षा कर सके। अंततः गुरुजी (गोलवलकर) ने अपना रुख बदला और मुखर्जी का समर्थन करने का फैसला किया।

"मैं प्रत्यक्ष साथ नहीं आऊंगा, लेकिन 5 स्वर्ण मुद्राएं दूंगा..."

संघ मुख्यालय में जब दोनों की दोबारा बैठक हुई, तो गुरुजी ने एक बेहद दिलचस्प बात कही। उन्होंने कहा, "मुखर्जी बाबू, संघ सीधे तौर पर राजनीतिक मंच पर आपके साथ नहीं खड़ा होगा, लेकिन मैं आपके इस नए सफर के लिए आपको '5 स्वर्ण मुद्राएं' (5 सोने के सिक्के) भेंट कर रहा हूँ।"

6. कौन थे ये 5 सोने के सिक्के? (जनसंघ के शिल्पकार)

ये '5 सोने के सिक्के' असल में कोई भौतिक सोना या धन नहीं था। ये संघ के 5 सबसे समर्पित, बुद्धिमान और युवा प्रचारक थे, जिन्हें गुरुजी ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ नई राजनीतिक पार्टी खड़ी करने के लिए भेजा था। भारतीय राजनीति के इतिहास में इन 5 चेहरों ने आगे चलकर एक बहुत बड़ा बदलाव लाया। ये 5 नाम थे:

  • दीनदयाल उपाध्याय: जिन्होंने 'एकात्म मानववाद' (Integral Humanism) का सिद्धांत दिया और जनसंघ की रीढ़ बने।
  • सुंदर सिंह भंडारी: जो पार्टी के महान रणनीतिकार और संगठनकर्ता साबित हुए।
  • नानाजी देशमुख: जिन्होंने ग्रामीण विकास और जेपी आंदोलन में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।
  • बापू साहेब सोहोनी: जिन्होंने संगठन को ज़मीनी स्तर पर खड़ा करने में रात-दिन एक कर दिया।
  • बलराज मधोक: जो पार्टी के प्रमुख विचारक और संस्थापक सदस्यों में से एक बने।

इन्हीं '5 सोने के सिक्कों' और संघ के हजारों समर्पित कार्यकर्ताओं की मेहनत का नतीजा था कि 21 अक्टूबर 1951 को 400 प्रतिनिधियों की मौजूदगी में 'भारतीय जनसंघ' (Bharatiya Jana Sangh) का जन्म हुआ। श्यामा प्रसाद मुखर्जी इसके पहले अध्यक्ष चुने गए। यही 'जनसंघ' आगे चलकर 1980 में आज की भारतीय जनता पार्टी (BJP) के रूप में स्थापित हुई, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी है।

7. "एक देश में दो विधान, दो प्रधान नहीं चलेंगे" (कश्मीर के लिए बलिदान)

श्यामा प्रसाद मुखर्जी का संघर्ष केवल बंगाल तक सीमित नहीं था। वे जम्मू-कश्मीर को भारत का पूर्ण अंग बनाना चाहते थे। उस समय कश्मीर में प्रवेश करने के लिए भारतीयों को एक विशेष 'परमिट' (Permit) की आवश्यकता होती थी, और वहां का अपना अलग प्रधानमंत्री और संविधान (Article 370) था।

मुखर्जी ने संसद में दहाड़ते हुए वह ऐतिहासिक नारा दिया था— "एक देश में दो विधान (संविधान), दो प्रधान (प्रधानमंत्री), और दो निशान (झंडे) नहीं चलेंगे!" बिना परमिट के कश्मीर में प्रवेश करने पर 11 मई 1953 को उन्हें शेख अब्दुल्ला की सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। कुछ ही हफ्तों बाद, 23 जून 1953 को रहस्यमय परिस्थितियों में श्रीनगर की जेल में उनका निधन हो गया। उनका यह बलिदान आज भी कश्मीर और भारतीय अखंडता के इतिहास का सबसे भावुक अध्याय है।

Zyvarta का निष्कर्ष: भारत के गुमनाम नायक

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार थे। अगर उन्होंने 1947 में 'यूनाइटेड बंगाल' के प्रस्ताव को कुचला न होता, तो आज पश्चिम बंगाल जैसा कोई राज्य भारत के नक्शे पर न होता। और अगर गुरुजी (गोलवलकर) ने उन्हें वो "5 सोने के सिक्के" (5 प्रचारक) न सौंपे होते, तो आज भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कोई वजूद न होता।

इतिहास की किताबों ने भले ही उनके योगदान को पन्नों में समेट दिया हो, लेकिन भारत का भूगोल हमेशा उनकी दूरदर्शिता का गवाह रहेगा। अगर आपको यह ऐतिहासिक जानकारी पसंद आई हो, तो इसे अपने दोस्तों के साथ जरूर शेयर करें और कमेंट में 'जय हिंद' लिखना न भूलें। 🇮🇳

Article By

Nitesh

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