वेस्टर्न हिपोक्रेसी का पर्दाफाश: डॉ. एस. जयशंकर ने यूरोप को कैसे दिखाया असली आईना
📌 इस आर्टिकल के मुख्य बिंदु (Key Highlights):
- रूस से तेल का सच: डॉ. जयशंकर ने खुलासा किया कि युद्ध के शुरुआत में खुद अमेरिका (US) ने भारत से कहा था कि वह रूस से तेल खरीदे ताकि ग्लोबल मार्केट क्रैश न हो।
- यूरोप का डबल स्टैंडर्ड: पश्चिमी देश भारत को नैतिकता का ज्ञान देते हैं, जबकि सच यह है कि यूरोपीय देशों के बेचे गए हथियारों से ही भारत पर कई बार हमले हुए हैं।
- 'इंडिया फर्स्ट' अप्रोच: भारत कोई राजनीतिक चाल नहीं चल रहा है। हम तेल वहां से खरीदते हैं जहां वह सस्ता और आसानी से उपलब्ध होता है।
- बदलती दुनिया की सच्चाई: यूरोप आज भी 80 साल पुरानी सोच में जी रहा है, जबकि दुनिया अब बहुत आगे निकल चुकी है। आज भारत किसी के दबाव में फैसले नहीं लेता।
- मिडिल ईस्ट और हमारी प्राथमिकता: खाड़ी देशों (Gulf Countries) में 1 करोड़ से ज्यादा भारतीय रहते हैं। हमारी नीतियां उनकी सुरक्षा और देश की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखकर बनती हैं, न कि यूरोप को खुश करने के लिए।
प्रस्तावना (Introduction): ग्लोबल पॉलिटिक्स में भारत का नया अवतार
एक वक्त था जब ग्लोबल पॉलिटिक्स में भारत की इमेज एक शांत और 'सबको खुश रखने वाले' देश की थी। अगर कोई पश्चिमी देश (Western Country) हम पर कोई इल्जाम लगाता था, तो हम डिफेंसिव मोड में आ जाते थे। लेकिन अब वक्त बदल चुका है। आज का भारत आंखें झुकाकर नहीं, बल्कि आंखें मिलाकर बात करता है।
इस नए और कॉन्फिडेंट भारत का सबसे बड़ा चेहरा बनकर उभरे हैं हमारे विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर। उनका बात करने का स्टाइल इतना लॉजिकल और फैक्ट्स पर आधारित होता है कि सामने वाले के पास कोई जवाब नहीं बचता। हाल ही में फिनलैंड के 'कुलतारंता वार्ता' (Kultaranta Talks) में उन्होंने ठीक ऐसा ही किया।
इस पैनल में उनके साथ फिनलैंड और UAE के मंत्री भी बैठे थे। चर्चा का टॉपिक था दुनिया में चल रहे युद्ध (जैसे रूस-यूक्रेन) और ग्लोबल सिक्योरिटी। हमेशा की तरह पश्चिमी देशों के पत्रकारों ने भारत को घेरने की कोशिश की, लेकिन जयशंकर जी ने ऐसे करारे और सीधे जवाब दिए कि वेस्टर्न मीडिया की 'हिपोक्रेसी' (दोगलापन) पूरी दुनिया के सामने बेनकाब हो गई। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि वहां असल में क्या-क्या हुआ।
1. रूसी तेल का ड्रामा और अमेरिका का सबसे बड़ा एक्सपोज
जब भी डॉ. जयशंकर किसी इंटरनेशनल मंच पर जाते हैं, उनसे एक सवाल जरूर पूछा जाता है— "भारत रूस से तेल खरीदकर पुतिन के युद्ध को फंड क्यों कर रहा है?" फिनलैंड में भी मॉडरेटर ने यही सवाल दागा। उसे लगा कि भारत को नैतिकता (Morality) के नाम पर घेरा जा सकता है। लेकिन जयशंकर जी का जवाब सीधा और एकदम प्रैक्टिकल था।
सिर्फ कीमत और उपलब्धता का खेल: उन्होंने साफ कहा, "मैं कोई मोरल या पॉलिटिकल स्टेटमेंट देने के लिए तेल नहीं खरीदता। मेरी जनता को तेल चाहिए। मैं वहां से खरीदता हूं जहां मुझे सही दाम (Cost) और सही सप्लाई (Availability) मिलती है।" सच तो यह है कि जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो घबराए हुए यूरोप ने रातों-रात मिडिल ईस्ट (जहां से भारत का तेल आता था) का सारा तेल महंगे दामों पर सोखना शुरू कर दिया। जब यूरोप ने सारा तेल खरीद लिया, तो भारत के पास क्या ऑप्शन बचा? जाहिर है, जहां से सस्ता तेल मिलेगा, हम वहीं जाएंगे, और वो ऑप्शन रूस था।
अमेरिका का असली चेहरा: सबसे बड़ा धमाका जयशंकर जी ने तब किया जब उन्होंने अमेरिका (US) की पोल खोली। उन्होंने बताया कि 2022 से पहले भारत रूस से ना के बराबर तेल लेता था। जब युद्ध शुरू हुआ, तो खुद अमेरिका ने भारत से कहा था कि वह रूस का तेल खरीदे! क्यों? क्योंकि अगर भारत जैसा बड़ा देश भी मिडिल ईस्ट से तेल मांगने लगता, तो पूरी दुनिया में पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छूने लगते और ग्लोबल मार्केट तबाह हो जाता। अमेरिका ने पहले तो अपने फायदे के लिए भारत से रूसी तेल खरीदने को कहा, फिर दिखावे के लिए हम पर टैरिफ (टैक्स) लगाने की धमकी दी, और जब उन्हें वापस दुनिया में तेल के दाम कम करने थे, तो उन्होंने अपनी धमकियां वापस ले लीं। जयशंकर जी ने मुस्कुराते हुए लेकिन सख्त लहजे में कहा— "हम सब यहां समझदार लोग (Adults) हैं। हमें पता है कि ये क्या गेम चल रहा है। इसलिए कोई हमें यहां ज्ञान न दे।"
2. हथियारों की बिक्री: जब यूरोप को दिखाया उसका अपना इतिहास
इस बातचीत का सबसे वायरल और दमदार हिस्सा तब आया, जब मॉडरेटर ने भारत पर 'मोरल एम्बिगुइटी' (यानी सही-गलत में फर्क न करने) का आरोप लगाया। यूरोप का मानना है कि भारत रूस से व्यापार करके गलत काम कर رہا है।
इस पर डॉ. जयशंकर ने यूरोप के उसी के इतिहास का ऐसा आईना दिखाया कि सब चुप रह गए। उन्होंने कहा: "आज तक किसी भी यूरोपीय देश पर 'इंडियन वेपन्स' (भारतीय हथियारों) से हमला नहीं हुआ है... लेकिन काश! मैं ये बात यूरोप के हथियारों के लिए कह पाता।"
यह बात सीधी पाकिस्तान की तरफ इशारा थी। दशकों से अमेरिका और यूरोपियन देश पाकिस्तान जैसे देशों को एडवांस हथियार (जैसे F-16 फाइटर जेट्स और सबमरीन) बेचते आए हैं। इन्हीं हथियारों का इस्तेमाल भारत के खिलाफ जंग में और आतंकवाद फैलाने के लिए हुआ है। भारत ने कभी यूरोप की शांति भंग नहीं की। लेकिन यूरोप ने सिर्फ पैसे कमाने के लिए हमारे रीजन (दक्षिण एशिया) की शांति को हमेशा खतरे में डाला है। ऐसे में, जिन देशों के हाथ खुद हथियारों की डीलिंग से काले हों, उनका भारत को इंसानियत और नैतिकता का लेक्चर देना सिर्फ एक मजाक है।
3. 'यूरोप की परेशानी, दुनिया की परेशानी है' - इस माइंडसेट का इलाज
यूरोप के लोगों को लगता है कि अगर उनके पड़ोस (यूक्रेन) में आग लगी है, तो पूरी दुनिया को अपना सब कुछ छोड़कर उस आग को बुझाने में लग जाना चाहिए।
जयशंकर जी ने बहुत ही साफ शब्दों में इस 'सेल्फ-सेंटर्ड' (आत्मकेंद्रित) सोच की बखिया उधेड़ दी। उन्होंने कहा कि हर देश की अपनी प्रायोरिटी होती है। अगर कोई देश किसी युद्ध से दूर है, तो उसके लिए वो युद्ध उतनी बड़ी टेंशन नहीं है। जब मिडिल ईस्ट या अफ्रीका में सालों तक युद्ध चलते रहे, तब तो यूरोप ने कभी उन्हें अपनी प्रॉब्लम नहीं माना। फिर आज जब यूरोप में दिक्कत है, तो वो भारत या बाकी दुनिया से ये उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि हम अपने सारे काम छोड़कर सिर्फ यूक्रेन के बारे में सोचें?
भारत के लिए उसकी अपनी सीमाएं (चीन और पाकिस्तान बॉर्डर) और उसकी अपनी अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी प्रायोरिटी है।
4. 1 करोड़ भारतीय और हमारा 'बैलेंसिंग एक्ट'
इंटरव्यू में एक सवाल ईरान और मिडिल ईस्ट को लेकर भी था कि भारत वहां कैसे बैलेंस बना रहा है। जयशंकर जी ने समझाया कि ग्लोबल पॉलिटिक्स कोई 'ब्लैक एंड व्हाइट' फिल्म नहीं है जहां एक हीरो और एक विलेन हो।
भारत शायद दुनिया का इकलौता ऐसा बड़ा देश है जिसके रिश्ते अमेरिका, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों (UAE, सऊदी अरब) सभी के साथ बहुत शानदार हैं। इसके पीछे कोई जादू नहीं, बल्कि हमारी जरूरतें हैं:
- हमारे लोग: आज खाड़ी देशों में लगभग 1 करोड़ (10 Million) भारतीय काम करते हैं। अकेले UAE में सबसे ज्यादा भारतीय प्रवासी हैं। हमारी पहली जिम्मेदारी उनकी सेफ्टी है।
- व्यापार और एनर्जी: ये देश हमारे टॉप-10 ट्रेडिंग पार्टनर्स में आते हैं।
उन्होंने एक बहुत ही इंट्रेस्टिंग डेटा शेयर किया कि कैसे दुनिया बदल रही है। युद्ध से पहले भारत का सबसे बड़ा गैस सप्लायर 'कतर' था, लेकिन आज भारत सबसे ज्यादा गैस अमेरिका से खरीद रहा है। वहीं, तेल के मामले में आज रूस हमारा सबसे बड़ा सप्लायर (लगभग 40%) बन गया है। इसका मतलब साफ है— भारत अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहता। हम अपने ऑप्शंस खुले रख रहे हैं। जहां से सबसे सही डील मिलेगी, भारत वहीं जाएगा।
5. 80 साल पुरानी सोच में अटका वेस्टर्न वर्ल्ड
पैनल के आखिर में जब बात आई कि क्या UN (संयुक्त राष्ट्र) जैसी संस्थाएं फेल हो रही हैं? इस पर जयशंकर जी का विजन एकदम क्लियर था।
उन्होंने कहा कि दुनिया के सिस्टम फेल नहीं हो रहे हैं, बल्कि दुनिया 'बदल' रही है। दिक्कत यह है कि पश्चिमी देश (खासकर यूरोप और अमेरिका) आज भी 80 साल पुराने माइंडसेट में फंसे हुए हैं। दूसरे विश्व युद्ध के बाद इन देशों ने जो ग्लोबल ऑर्डर बनाया था, उन्हें लगता है कि आज भी वही चलेगा।
लेकिन सच्चाई यह है कि दुनिया की इकोनॉमी और पावर अब शिफ्ट हो रही है। भारत, UAE, और साउथ-ईस्ट एशिया के देश अब ताकतवर बन चुके हैं। वे अब पश्चिमी देशों के इशारों पर नहीं नाचते। यही बदलाव यूरोप और अमेरिका को हजम नहीं हो रहा है, जिसकी वजह से ये सारा फ्रस्ट्रेशन और कूटनीतिक तनाव (Diplomatic Tension) देखने को मिल रहा है।
निष्कर्ष (Conclusion): नया भारत, नई नीतियां
कुलतारंता वार्ता का यह पूरा एपिसोड इस बात का सुबूत है कि भारत की फॉरेन पॉलिसी (विदेश नीति) में अब 'सॉरी' या 'क्षमा याचना' के लिए कोई जगह नहीं है। हम शांति चाहते हैं। डॉ. जयशंकर ने भी कहा कि कोई भी युद्ध अच्छी बात नहीं है और इसका हल निकलना चाहिए। लेकिन अगर कोई देश यह सोचे कि वह भारत को गिल्ट-ट्रिप (Guilt-trip) में डालकर या दबाव बनाकर अपने हिसाब से चला लेगा, तो वह गलतफहमी में है।
आज का भारत अपने नेशनल इंट्रेस्ट (राष्ट्रीय हितों) को सबसे ऊपर रखता है। रूसी तेल खरीदना हो या दुनिया भर के देशों के साथ एक साथ रिश्ते निभाना हो, हमारी पॉलिसी एकदम क्लियर है— "इंडिया फर्स्ट"। और जब डॉ. जयशंकर जैसे लीडर्स इस बात को फैक्ट्स और लॉजिक के साथ दुनिया के सामने रखते हैं, तो अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती है।
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